ताहिर फराज का इंतेकाल देवा मेला मुशायरा कमेटी के लिए बड़ा खसारा है: तालिब नजीब कौकब

ताहिर फराज का इंतेकाल देवा मेला मुशायरा कमेटी के लिए बड़ा खसारा है: तालिब नजीब कौकब

ताहिर फराज का इंतेकाल देवा मेला मुशायरा कमेटी के लिए बड़ा खसारा है: तालिब नजीब कौकब


ताहिर फराज के इंतेकाल से सिर्फ मुशायरों का नुकसान नहीं बल्कि उर्दू अदब और उर्दू जुबान का भी नुकसान: फ़ज़ल इनाम मदनी 

सैफ मुख्तार/संवादाता रिपब्लिक रेनेसाँ 

बाराबंकी: देवा मेला कमेटी के दफ्तर में मंगलवार को देवा मेला मुशायरा कमेटी की तरफ से मशहूर-ओ-मकबूल शायर मरहूम ताहिर फराज के लिए एक ताजियती तकरीब का आयोजन किया गया। ताजियती तकरीब में देवा मेला मुशायरा कमेटी के अराकीन ने मरहूम ताहिर के किरदार और अफकार पर रोशनी डाली और उन्हें खराज-ए-अकीदत पेश की। जिले के सीनियर सहाफी तारिख किदवाई की सदारत में हुए इस ताजियती जलसे में देवा मेला मुशायरा कमेटी के सेक्रेटरी तालिब नजीब कौकब ने कहा कि मरहूम ताहिर फराज का देवा मेला मुशायरा से खास लगाव था। तकरीबन 35 बरसों से वो देवा मेला मुशायरा से वाबिस्ता रहे। जनाब कौकब ने कहा कि ताहिर फराज का इंतेकाल देवा मेला मुशायरा कमेटी के लिए बड़ा खसारा है। जिले की मारूफ अदबी शख्सियत और उर्दू की तमाम इस्नाफे सुखन का गहराई और संजीदगी से मुताअला करने वाले फजल इनाम मदनी ने कहा कि रामपुर मकतबे शायरी के वो नुमाइंदा शायर थे। उऩका उसलूब रोमानी था। लेकिन जिद्दत पसंदी की झलक भी उनमें नजर आती थी। फजल इनाम मदनी ने बताया कि उनकी खास बात ये थी कि उन्होंने क्लासिकल और रवायती शायरी के साथ हालात-ए-हाजरा के मसायल भी वो बहुत ही खूबसूरती के साथ उठाते थे। उन्होंने ताहिर फराज के इंतेकाल को सिर्फ मुशायरों का ही नुकसान नहीं बतायास  बल्कि उन्होंने इसे उर्दू अदब और उर्दू जुबान का नुकसान बताया।ताजियती तकरीब के सदर सीनियर सहाफी तारिख खान ने ताहिर फराज को खराज-ए-अकीदत पेश करते हुए कहा कि 70 की दहाई में उन्होंने देवा मेले पर ताहिर फराज को पहली बार देखा था। उन्होंने कहा कि उस वक्त गजल और नज्म के बड़े शायर हुआ करते थे। उसमें उन्होंने अपने कलाम और तरन्नुम से अपनी जगह बनाई और गजल की दुनिया में तो उन्होंने नाम कमाया ही नज्म की दुनिया में भी मकबूलियत हासिल की। उऩका शुमार मुशायरा लूटने वालों शायरों में हुआ करता था। आलमी शोहरत याफ्ता शायर उस्मान मिनाई ने मरहूम ताहिर फराज को खराज-ए-अकीदत पेश करते हुए कहा कि ताहिर फराज खुश एखलाक और खुश लिबास शख्सियत के मालिक थे। उन्होंने कभी बुग्ज नहीं किया। अगर कोई शेर उन्हें अच्छा लगा, तो वो दाद देने में कभी पीछे नहीं रहे। उन्होंने कहा कि ताहिर फराज साहब खुमार बाराबंकवी के बाद गजल के नुमाइंदा शायर थे। उन्होंने कभी हालात से समझौता नहीं किया। ताजियती तकरीब को एडवोकेट अली गदीर रिजवी, मो वली सिद्दीकी, अक्षत वर्मा ने भी खिताब किया। तकरीब में निजामत के फराएज को अंजाम अदबी और समाजी कारकुन सैयद मो हारिस ने दिया। इस मौके पर सैफ मुख्तार, एडवोकेट सरफराज आदि लोग मौजूद रहे।