सूना जंगल, सूनसान इलाका और जंगल में लगे सरकारी बोर्ड—कहीं संकेत है, कहीं कार्यालय नदारद
सूना जंगल, सूनसान इलाका और जंगल में लगे सरकारी बोर्ड—कहीं संकेत है, कहीं कार्यालय नदारद
जनहितकारी योजनाओं से आमजन को वंचित कर दलाली की दहलीज पर खड़ा कर रहे लापरवाह अधिकारी
दैनिक रिपब्लिक रैनैसां ब्यूरो हरी सिंह वर्मा
महोबा।
योगी सरकार की जनहितकारी योजनाओं को आम जनता तक पहुँचाने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों के कंधों पर है, वही अधिकारी महोबा जनपद में इन योजनाओं को जंगल के हवाले करते नजर आ रहे हैं। स्थिति यह है कि कई विभागों के कार्यालयों के संकेत बोर्ड दफ्तर के पीछे जंगलों और सूनसान इलाकों में लगाए गए हैं, जिससे आमजन को न तो कार्यालय की जानकारी मिल पाती है और न ही सरकारी योजनाओं का लाभ।
जिले में यह दृश्य आम हो गया है कि सड़क किनारे जहां सरकारी विभागों के बोर्ड होने चाहिए, वहां सन्नाटा है, जबकि कार्यालय के पीछे जंगलों में सरकारी बोर्ड लगे हुए हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि अधिकारियों को आम जनता से नहीं, बल्कि दलालों से सरोकार है। आम नागरिक जब बोर्ड देखकर कार्यालय ढूंढने निकलता है, तो उसे जंगल में लगे संकेत बोर्ड ही नजर आते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब कार्यालय का बोर्ड ही जंगल में लगा होगा, तो गरीब, पिछड़े और जरूरतमंद लोगों को यह कैसे पता चलेगा कि कौन-सी योजना कहां संचालित हो रही है। इससे यह संदेह और गहराता है कि कई विभागों के कार्यालय केवल दलालों के लिए ही खुले रहते हैं, क्योंकि वही लोग जानते हैं कि असली दफ्तर कहां और किसके संपर्क से काम होगा।
बताया जा रहा है कि समाज कल्याण विभाग, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग एवं जिला प्रोमोशन विभाग जैसे महत्वपूर्ण विभागों के बोर्ड कार्यालय के पीछे जंगल में लगे हुए हैं, जो अधिकारियों की घोर लापरवाही को उजागर करते हैं। जिन विभागों के माध्यम से छात्रवृत्ति, पेंशन और अन्य कल्याणकारी योजनाएं संचालित होती हैं, उनके बारे में आमजन को जानकारी ही नहीं मिल पा रही है।
गौरतलब है कि जिस जिले से विकास की गंगा बहने का दावा किया जाता है, उसी जिले में ऐसे अधिकारी भी मौजूद हैं, जो अपने कार्यालय को विकास की मुख्यधारा से दूर जंगल में दर्शा रहे हैं। इससे यह संदेश जा रहा है कि योजनाएं कागजों में हैं, जबकि धरातल पर उनका लाभ सीमित वर्ग तक ही सिमट कर रह गया है।
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि कई अधिकारी कार्यालयों में बैठकर दिनभर मोबाइल चलाते और गप्पे मारते देखे जा सकते हैं, जबकि योजनाओं के प्रचार-प्रसार और क्रियान्वयन में कोई रुचि नहीं दिखाई जाती। परिणामस्वरूप आमजन को मजबूरी में दलालों का सहारा लेना पड़ता है और वही लोग योजनाओं का लाभ उठा लेते हैं।
लोगों का कहना है कि सरकार की तनख्वाह तो अधिकारी ले रहे हैं, लेकिन योजनाओं से कमाई दलाली के जरिए की जा रही है। यदि यही हाल रहा तो जनहितकारी योजनाओं का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
अब सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन इस गंभीर लापरवाही पर संज्ञान लेगा, या फिर सरकारी योजनाओं के बोर्ड यूं ही जंगलों में “शोभा” बढ़ाते रहेंगे।
admin