सफलता का दबाव और मानसिक संतुलन की चुनौतियां
सफलता का दबाव और मानसिक संतुलन की चुनौतियां
नेहा खरे की कलम से.....
असाधारण सफलता के बाद मन शांति, सादगी और संतुलन की तलाश में पीछे लौटना चाहता है
वर्ष 2026 की शुरुआत कई अप्रत्याशित और चौंकाने वाले निर्णयों के साथ हुई है।
देश-प्रदेश की चर्चित हस्तियों द्वारा अचानक लिए गए फैसले—कहीं इस्तीफ़ा, कहीं लंबे अंतराल की घोषणा, तो कहीं कला क्षेत्र से दूरी—समाज को गहराई से सोचने पर मजबूर कर रहे हैं। ये सभी वे व्यक्तित्व हैं, जिन्हें अपने-अपने क्षेत्र में सफलता के शिखर पर माना जाता है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या निरंतर अपेक्षाओं और मानसिक दबाव ने उन्हें यह कठोर निर्णय लेने के लिए विवश किया? या फिर असाधारण सफलता के बाद मन शांति, सादगी और संतुलन की तलाश में पीछे लौटना चाहता है? संभव है कि इसके पीछे व्यक्तिगत कारण भी हों, लेकिन मानसिक दबाब को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। यदि मानसिक दबाव ही प्रमुख कारण है, तो यह हमारे समय की एक गंभीर चेतावनी है।
यह नहीं भूलना चाहिए कि इस मुकाम तक पहुँचने के लिए इन लोगों ने वर्षों तक संघर्ष, परिश्रम और त्याग किया है। किंतु जब सफलता ही मानसिक बोझ बन जाए, तो यह स्पष्ट संकेत है कि हमने सफलता को केवल उपलब्धियों और शोहरत तक सीमित कर दिया है।
यही स्थिति आज बच्चों के भविष्य निर्माण में भी दिखाई देती है। पढ़ाई, प्रतियोगिता और माता-पिता की बढ़ती अपेक्षाओं का दबाव बच्चों के मन पर गहरा असर डाल रहा है। यह समझना आवश्यक है कि जैसे हर वस्तु की सहनशीलता की एक सीमा होती है, वैसे ही मानव मस्तिष्क की भी एक सीमा होती है।
जिन व्यक्तियों को हम बच्चों के सामने आदर्श के रूप में प्रस्तुत करते हैं, उनके बाहरी वैभव के साथ-साथ उनकी मानसिक स्थिति को समझना भी उतना ही आवश्यक है। केवल सफलता नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन भी जीवन की सच्ची उपलब्धि है।
अब समय आ गया है कि समाज बच्चों को केवल लक्ष्य की दौड़ में शामिल करने वाला नहीं, बल्कि मानसिक रूप से सशक्त, संवेदनशील और संतुलित इंसान बनाने पर ध्यान दे। अंधी प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि संतुलित सोच ही एक स्वस्थ समाज की नींव रख सकती है।
— नेहा खरे
(समीक्षा अधिकारी)
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
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