सामान्य जन की क्रय शक्ति को कमजोर करता बजट

सामान्य जन की क्रय शक्ति को कमजोर करता बजट

सामान्य जन की क्रय शक्ति को कमजोर करता बजट

देश में मंदी, मंहगाई, आर्थिक संकट और बढ़ेगा 

सुधीर श्रीवास्तव 
ब्यूरो/ रिपब्लिक  रेनैसां 

लखनऊ। आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट की राष्ट्रीय कार्य समिति ने बजट पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए जारी बयान में कहा कि केंद्र सरकार द्वारा कल संसद में 53 लाख 40 हजार करोड़ का बजट पेश किया गया है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए जीडीपी अनुमान 393 लाख करोड़ है। बजट के संसाधन जुटाने में 16 लाख करोड़ की भारी-भरकम राशि में उधार व अन्य देयताएं शामिल है। जिसका नतीजा है कि देश में कर्ज तेजी से बढ़ा है और बजट का एक बड़ा हिस्सा 14 लाख करोड़ ब्याज अदायगी में खर्च हो जाता है।  इसी तरह कारपोरेट टैक्स का योगदान 12 लाख करोड़ है जोकि आम तौर पर मध्य वर्ग द्वारा अदा किए जाने वाले इनकम टैक्स 14.6 लाख करोड़ से कम है। पूंजी गत व्यय भी जिसे बढ़ाया गया है वह भी मुख्यतः नेशनल हाईवे व रेलवे कारिडोर जैसे मदों पर है जिसका लाभ कारपोरेट व धनाढ्य वर्ग को होगा। इस पूंजी गत व्यय में शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि क्षेत्र के इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बेहद कम है। स्पष्ट है कि संसाधन जुटाने में आम आदमी पर बोझ डाला गया है जबकि उनके ऊपर खर्च यथावत है जोकि पहले से ही बेहद कम है। 
          बजट से स्पष्ट है कि सरकार ने सामाजिक सुरक्षा की जवाबदेही से पल्ला झाड़ा है। बहुप्रचारित न्यू इंटर्नशिप प्रोग्राम में 10831 करोड़ आवंटित बजट में महज 526 करोड़ ही खर्च हो पाया, इस मद में बजट घटाकर 4788 करोड़ कर दिया गया। इसी तरह एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय में आवंटित 7089 करोड़ में 4900 करोड़, स्किल इंडिया में 2700 करोड़ में महज 200 करोड़ रुपए खर्च किए गए। 
        बजट में सरकारी विभागों में रिक्त पदों को भरने, स्कीम वर्कर्स के लिए सम्मानजनक वेतनमान, सरकारी कर्मचारियों की पुरानी पेंशन बहाली जैसी न्यूनतम मांगों को हल करने का जिक्र तक नहीं है। 
       कुल मिलाकर बजट की दिशा कारपोरेट व धनाढ्य वर्ग के हितों के अनुरूप है। जरूरत थी कि कारपोरेट व धनाढ्य वर्ग की संपत्ति पर समुचित टैक्स लगाया जाता जिससे विदेशी कर्ज पर निर्भरता भी घटती और रोजगार सृजन, सामाजिक कल्याण, छोटे मझोले उद्योगों और कृषि जैसे क्षेत्रों में निवेश में बढ़ोतरी होती, जिससे आम नागरिकों की क्रय शक्ति बढ़ती और महंगाई व मंदी से देश उबरता। लेकिन यह न करके सरकार के बजट से लोगों की क्रय शक्ति, सामाजिक सुरक्षा घटेगी और देश गंभीर आर्थिक संकट का सामना करेगा।