कांग्रेस के मनरेगा से बीजेपी के वीबी-जी-रामजी तक.
कांग्रेस के मनरेगा से बीजेपी के वीबी-जी-रामजी तक.
कांग्रेस के मनरेगा से बीजेपी के वीबी-जी-रामजी तक.... (भाग-1)
सुधीर श्रीवास्तव, लेखक व सम्पादक
मनरेगा को ‘महात्मागाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारन्टी योजना’ के नाम से जाना जाता है। ग्रामीण विकास मंत्रालय भारत सरकार द्वारा वित्तीय वर्ष 2005 में शुरू की गई यह विश्व की सबसे बड़ी रोजगार गारन्टी योजना है। वर्तमान सरकार ने मनरेगा योजना को संशोधित किया है जो अब विकसित भारत 2047 के साथ एक नई संरचना के साथ मनरेगा का स्थान लेगी। इस नई योजना को विकसित भारत रोजगार और आजीविका गारन्टी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025’ का नाम दिया गया है।
रोजगार की गारन्टी का मूल अधिकार बरकरार रखते हुए भी यह नया विधेयक संरचना, फंडिंग और कार्यान्वयन व्यवस्था में मनरेगा से काफी अलग है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा नया विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया गया अगर अब यह नया ‘विकसित भारत रोजगार और आजीविका गारन्टी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025’ लगभग दो दशक पुराने महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारन्टी अधिनियम (मनरेगा) 2005 का स्थान लेगा। पूर्ववर्ती मनरेगा योजना में कुछ परिवर्तन कर इसे और उपयोगी बनाया गया है। जैसे कि पहले की योजना में अकुशल शारीरिक श्रम करने वाले श्रमिकों को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में कम से कम 100 दिन का रोजगार प्रदान किया जाता था जिसे वर्तमान में 125 दिन का रोजगार दिया जाना प्राविधानित किया गया है।
नए अधिनियम में प्रावधान :-
नए अधिनियम के सेक्शन 5(1) में केन्द्र सरकार को किसी राज्य में ग्रामीण इलाकों को नोटिफाई करने का अधिकार दिया गया है, जहाँ पर यह स्कीम लागू की जाएगी। इस प्रकार केन्द्र द्वारा नोटिफाई किए गए ग्रामीण क्षेत्रों में ही रोजगार दिया जाएगा। नए अधिनियम का मूल प्रावधान यह है कि हर ग्रामीण परिवार, जिसके वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक श्रम करने को इच्छुक हों, को साल में कम से कम 125 दिन का काम दिया जाएगा। मनरेगा योजना मांग आधारित थी जिसमें जरूरत के हिसाब से बजट बढ़ाया जा सकता था। परन्तु, नए प्रस्तावित कानून के तहत राज्यों के लिए आवंटन केन्द्र सरकार के फिक्स्ड बजट के अन्दर ही सीमित रहेंगे। काम करने वाले श्रमिकों को मजदूरी का भुगतान साप्ताहिक या अधिकतम एक पखवाड़े के भीतर करना अनिवार्य होगा। मजदूरी की दर को लेकर इसमें कहा गया है कि केन्द्र सरकार की तरफ से नई मजदूरी दर अधिसूचित किए जाने तक मनरेगा के तहत लागू न्यूनतम मजदूरी दर ही लागू रहेगी, यानी मजदूरी में किसी भी तरह की कमी नहीं की जा सकती।
नए अधिनियम के तहत सभी कार्यों को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया है। इसमें प्रथम- जल सुरक्षा से जुड़े कार्य हैं। जैसे- जल संरक्षण, सिंचाई, भूजल, जल स्रोतों का पुनर्जीवन, वाटरशेड का विकास और वृक्षारोपण जैसे कार्य शामिल होंगे। दूसरे- ग्रामीण बुनियादी ढांचा सम्बन्धित कार्य जैसे- ग्रामीण सड़कों, पुलों, पंचायत भवनों, आंगनवाड़ी केन्द्रों, स्कूल भवनों, पेयजल, स्वच्छता, सौर ऊर्जा और अन्य सामुदायिक सुविधाओं का निर्माण और मरम्मत जैसे कार्य होंगे। तीसरे- आजीविका से जुड़े ढांचागत कार्य जिसमें- कृषि भंडारण, ग्रामीण हाट, कौशल विकास केन्द्र, पशुपालन और मत्स्य पालन से जुड़ा ढांचा, स्वयं सहायता समूहों के लिए भवन आदि से जुड़े कार्य होंगे। तथा चैथे- मौसम और आपदा प्रबन्धन से जुड़े कार्य जैसे-बाढ़, सूखा, चक्रवात, भूस्खलन और अन्य आपदाओं से निपटने के लिए ढांचे, शरण स्थल, मरम्मत और पुनर्वास कार्य किए जाएंगे।
खेती के मौसम में काम पर रोक:-
मनरेगा की अपेक्षा नई योजना में एक बड़ा बदलाव यह है कि इसमें खेती के पीक सीजन में काम रोकने का स्पष्ट प्रावधान किया गया है। राज्यों को साल में अधिकतम 60 दिन का समय अधिसूचित करना होगा, जिसमें बुवाई और कटाई के दौरान इस योजना के तहत कोई काम नहीं होगा। इससे कृषि कार्यों के लिए मजदूरों की उपलब्धता बनी रहेगी।
बेरोजगारी भत्ता और श्रमिक कार्ड :-
यदि किसी परिवार को काम मांगने के 15 दिन के भीतर रोजगार नहीं मिलता है, तो मनरेगा की तरह उसे बेरोजगारी भत्ता मिलेगा। पहले 30 दिनों के लिए यह भत्ता मजदूरी का कम से कम 25 प्रतिशत और उसके बाद 50 प्रतिशत से कम नहीं होगा। इस भत्ते की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की होगी। हर परिवार को ग्रामीण रोजगार गारन्टी कार्ड दिया जाएगा, जिसकी वैधता तीन वर्ष होगी। महिलाओं, दिव्यांगों, बुजुर्गों, विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए विशेष कार्ड का प्रावधान किया गया है।
नई संस्थागत व्यवस्था- इस नई व्यवस्था के तहत केन्द्र और राज्य स्तर पर ग्रामीण रोजगार गारन्टी परिषद तथा नीति निर्धारण और निगरानी के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय स्टीयरिंग समितियों का गठन किया जाएगा। विभिन्न मंत्रालयों से सामंजस्य का दायित्व इन्हीं समितियों का होगा। प्रत्येक जनपद में जिलाधिकारी को कार्यक्रम समन्वयक का दायित्व तथा मजदूरों की मांग-आपूर्ति का प्रबन्धन, बेरोजगारी भत्ता को मंजूरी देने और समय पर मजदूरी का भुगतान करने का दायित्व ब्लाक कार्यक्रम अधिकारी का होगा। योजना का नियमित सामाजिक अंकेक्षण अर्थात सोशल आडिट का दायित्व ग्राम सभाओं का होगा।
मनरेगा में श्रम लागत का 100 प्रतिषत और मैटीरियल लागत का 75 प्रतिशत फन्ड केन्द्र सरकार देती है और राज्य सरकारें मैटीरियल लागत का 25 प्रतिशत योगदान करती हैं। जबकि नई योजना में राज्यों की हिस्सेदारी में बढ़ोत्तरी की गई है। पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए केन्द्र और राज्य की फन्डिंग का अनुपात 90 प्रतिषत/10 प्रतिशत होगा। बाकी राज्यों के लिए यह अनुपात 60 प्रतिशत/40 प्रतिशत का रहेगा। जबकि केन्द्रशासित प्रदेशों के लिए 100 प्रतिशत राशि केन्द्र सरकार देगी। केन्द्र सरकार हर राज्य के लिए सालाना आवंटन निर्धारित करेगी। बेरोजगारी भत्ता और देरी के मुआवजे का खर्च राज्य सरकारों को वहन करना होगा। राज्यों को यह विकल्प भी दिया गया है कि यदि उनके पास समान या बेहतर रोजगार गारन्टी योजना है, तो वे उसे लागू कर सकते हैं।
क्रमशः अगले अंक में ........
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