प्रश्नपत्र में छुपा जहर और सत्ता की चुप्पी: व्यवस्था के आत्ममंथन का समय
प्रश्नपत्र में छुपा जहर और सत्ता की चुप्पी: व्यवस्था के आत्ममंथन का समय
लेखक: दीपक शुक्ला ‘पसगवां’
रिपब्लिक रैनसा पसगवां से
प्रतियोगी परीक्षाएँ केवल रोजगार पाने का साधन नहीं होतीं, बल्कि वे राष्ट्र के निर्माण में जुटने वाली नई पीढ़ी की योग्यता, नैतिकता और मानसिकता की कसौटी होती हैं। लेकिन जब इन्हीं परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों में किसी समाज या समुदाय की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले शब्द चुपके से डाल दिए जाते हैं, तो वह केवल एक 'लिपिकीय त्रुटि' (Clerical Error) नहीं, बल्कि व्यवस्था में घुले उस सूक्ष्म जहर का प्रमाण है जो समाज को भीतर ही भीतर खोखला कर रहा है।
हाल ही में दरोगा भर्ती परीक्षा में एक प्रश्न पूछा गया— “अवसर के अनुसार बदल जाने वाला क्या कहलाता है?” और उसके विकल्पों में “पंडित” शब्द का चयन किया गया। यह केवल एक शब्द का चुनाव नहीं है, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, परंपरा और सामाजिक पहचान पर किया गया एक क्रूर तंज है।
मानसिकता का आईना और दोहरा मापदंड
प्रश्न यह नहीं है कि यह विकल्प किसने और क्यों लिखा; मूल प्रश्न यह है कि ऐसी दूषित सोच किस वातावरण में फल-फूल रही है? जहाँ किसी विशिष्ट समाज को व्यंग्य या उपहास का पात्र बनाना सामान्य समझ लिया जाता है।
यहाँ व्यवस्था का दोहरा मापदंड भी स्पष्ट दिखाई देता है। यदि यही शब्द किसी अन्य समुदाय या वर्ग के लिए प्रयोग किया गया होता, तो अब तक सड़कों से लेकर संसद तक हंगामा बरप चुका होता। जाँच की कमेटियाँ बैठ जातीं, निलंबन के आदेश जारी हो जाते और सत्ता के शीर्ष से माफीनामा आ जाता। फिर इस विशेष प्रकरण पर यह रहस्यमयी सन्नाटा क्यों है? क्या "सबका साथ, सबका विकास" का नारा कुछ वर्गों के अपमान की छूट देता है?
परंपरा का अपमान और भाषा का पतन
भारत की सनातन संस्कृति संतों, विद्वानों और गुरुओं की थाती है। यहाँ ‘पंडित’ शब्द का अर्थ सदैव 'ज्ञानी' और 'विद्या के उपासक' से रहा है। उस शब्द को 'अवसरवादिता' के साथ जोड़ना न केवल भाषा का पतन है, बल्कि हमारी गौरवशाली शिक्षा-परंपरा का भी अपमान है। जब शिक्षा देने वाली संस्थाएँ ही समाज को बाँटने वाले या किसी वर्ग विशेष की छवि बिगाड़ने वाले संकेत देने लगें, तो समझ लेना चाहिए
व्यवस्था गंभीर रूप से बीमार है।
सत्ता का कर्तव्य और समाज की मांग
लोकतंत्र में सम्मान किसी एक जाति का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। प्रशासन का इस मामले को "छोटी गलती" मानकर नजरअंदाज करना सामाजिक अविश्वास की आग में घी डालने जैसा है।
अतः समय की मांग है कि:
निष्पक्ष जाँच: प्रश्नपत्र तैयार करने वाली समिति और उस मानसिकता की गहराई से जाँच हो जिसने इस विकल्प को अनुमति दी।
जवाबदेही: जिम्मेदार अधिकारियों और विशेषज्ञों पर ऐसी सख्त कार्रवाई हो जो भविष्य के लिए मिसाल बने।
स्पष्ट नीति: भविष्य में किसी भी समुदाय, धर्म या वर्ग की भावनाओं से खिलवाड़ न हो, इसके लिए परीक्षाओं हेतु सख्त 'एथिकल गाइडलाइन्स' बनाई जाएँ।
किसी भी राष्ट्र की मजबूती उसकी संवेदनशीलता और आपसी सम्मान में टिकी होती है। यदि हम आज इस वैचारिक प्रदूषण के खिलाफ नहीं बोले, तो कल यह किसी और की गरिमा को निशाना बनाएगा। सत्ता को समझना होगा कि अनसुना करना समाधान नहीं है; न्याय और सम्मान की स्थापना ही सुशासन की असली पहचान है।
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